Saturday, 23 June 2018

OPINION: लोकसभा के रण में छत्रपों के साथ की कोशिश में राहुल, पर राह में मुश्किलें अनेक


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भावदीप कंग
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लीड करने की अपनी हसरतों को संभवत: दबा लिया है, लेकिन क्या वह विपक्षा पार्टियों के महागठबंधन को एकजुट करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं? हालांकि यह भी कुछ खास संभव नहीं दिखता, क्योंकि महागठंबधन के साझीदार उन्हें ज्यादा महत्व देते नहीं दिख रहे.भारत की इस सबसे पुरानी पार्टी 2004 में हुए लोकसभा चुनाव के कारनामे को दोहराने की उम्मीद लगाए बैठी है. हालांकि अभी तक यह साफ नहीं कि वह बीजेपी को हराने के लिए किस हद तक जा सकेगी. क्या वह इसके लिए ‘करो या मरो’ की लड़ाई की तैयारी में है, या फिर किसी गहरी रणनीति पर काम कर रही है?


कांग्रेस फिलहाल तो अपने संभावित गठबंधन सहयोगियों को जोड़े रखने के लिए समझौते करती ही दिख रही है. पार्टी का एक धड़ा इसे आत्मघाती मान रहे हैं, तो कुछ को लगता है कि सत्ता में वापसी के लिए यही आखिरी उम्मीद है.केरल में राज्यसभा की एकमात्र सीट अपने पुराने सहयोगी केरल कांग्रेस (मणि) को देने के फैसले पर वहां के कांग्रेसी विधायकों ने सख्त ऐतराज़ भी जताते हुए इसे आत्मघाती बताया था. महाराष्ट्र और झारखण्ड में लोकसभा सीटों के लिए हुए हालिया उपचुनाव में कांग्रेस ने महाराष्ट्र की सीट एनसीपी और झारखंड को दोनों सीट जेएमएम को दे दी. कर्नाटक में जेडी(एस) को मुख्यमंत्री का पद और महत्वपूर्ण मंत्रालय देने को लेकर अब पार्टी के अंदर सवाल खड़े होने लगे हैं.


कांग्रेस और जेडीएस कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती कड़वाहट से सिद्धारमैया के लिए परेशानी खड़ी करने वाली बात है. अगर वह नेता प्रतिपक्ष होते तो उनके पास लड़ने के लिए एक और दिन होता. लेकिन अब एचडी देवगोड़ा की दया पर हैं, जो उनके राजनीतिक गुरु से दुश्मन और दुश्मन के बाद गठबंधन सहयोगी है. बीजेपी भी इससे खुश नहीं है क्योंकि जो सिद्धारमैया उनके निशाने पर होते थे वह अब अपने पद पर नहीं रहे और इन दिनों वह जेडीएस के साथ गठबंधन को कायम रखने के लिए रोज लड़ाई लड़ रहे हैं.


बिना किसी वायदे के सहयोगियों के लाभ के लिए पहले से कमजोर अपनी जमीन देकर कांग्रेस बड़ा जुआ खेल रही है, क्योंकि राज्य स्तर पर इससे असंतोष पैदा हो सकता है. कांग्रेस नेतृत्व के लिए विनम्रता दिखाना एक बात है और विधायकों और कार्यकर्ताओं से उस विनम्रता की कीमत चुकाने की उम्मीद करना दूसरी बात. कांग्रेस अगर पार्टी को फिर से मजबूत करना चाहती है तो उसे बीजेपी से बदला नहीं बल्कि पार्टी की आंतरिक संचरना में बड़े बदलाव करने होंगे.


उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में एसपी-बीएसपी कांग्रेस की आकांक्षाओं और शर्तों को मानने के लिए उत्साहित नहीं दिख रही हैं, जिस कारण पार्टी कार्यकर्ता निराश हो सकते हैं. इसके उलट कांग्रेस दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में गठबंधन की इच्छुक नहीं दिखती.


ऐसे एक अखिल भारतीय गठंधन बनता तो दिख नहीं रहा है, अगर हितों के टकराव की जटिलताओं को खत्म करना है तो इसके लिए मैकियावेली के वार्ता कौशल की जरूरत होगी. फिलहाल तो कांग्रेस नेतृत्व वाला मौजूदा यूपीए गठबंधन 100 सीटों पर भी जीत दर्ज करने की स्थिति में नजर नहीं आ रहा है, हालांकि इसके पीछे कई मान्यताएं हैं.


सबसे पहले कांग्रेस का स्ट्राइक रेट राहुल की बजाए मनमोहन सिंह जैसा होना चाहिए. देश की सबसे पुरानी पार्टी अब भी देश के आधे से अधिक राज्यों में प्रासंगिक है. 275 से 280 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस सीधे टक्कर में है, वहीं 260 सीटों पर पार्टी का अच्छा खासा प्रभाव है. ऐसे में कांग्रेस अगर आगामी चुनाव में 100 से ज्यादा सीटें जीत लेती है, तो उसका स्ट्राइक रेट 46% होगा, जो कि 1991 के लोकसभा चुनाव के बाद सबसे अच्छा होगा. इससे पहले 2014 के आम चुनाव में राहुल गांधी का स्ट्राइक रेट 10 फीसदी से भी कम था. वहीं 2004 में सोनिया गांधी का स्ट्राइक रेट 33 प्रसेंट और 1999 में 25 प्रसेंट रहा था.


दूसरा कांग्रेस को असावधानी से होने वाली गलतियों से भी बचना होगा, जैसा कि आरएसएस के कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी के भाषण पर नफरत-प्यार-नफरत-प्यार जैसी प्रतिक्रिया और बेंगलुरु के वानबे में राहुल गांधी की प्रधानमंत्री पर की गई टिप्पणी के दौरान देखने को मिला.


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)


Article source: http://feedproxy.google.com/~r/Khabar-Cricket/~3/gWPU3RhD9BM/story01.htm

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