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‘एक निवाले सी निगल जाती है ये नींद मुझे
रेशमी मोज़े निगल जाते हैं पांव जैसे
सुबह लगता है की ताबूत से निकला हूं अभी’
गुलज़ार की लिखी इन लाइनों को पढ़कर लगता है कि नींद हो तो ऐसी. इस तनाव ग्रस्त जीवनशैली में खुशनसीब है वह शख्स जिसे अच्छी नींद लेने का नसीब हासिल है. अगर ऐसा नहीं है और आपको सुबह उठने के लिए अलार्म की जरूरत पड़ती है, तो इसका मतलब कुछ ठीक नहीं है. वैसे कितने घंटे की नींद, भरपूर नींद होती है इसे लेकर मतभेद रहे हैं. कुछ शोध कहते हैं कि स्वस्थ रहने के लिए व्यस्क को औसत 7 घंटे की नींद लेना जरूरी है. वहीं कुछ और रिसर्च कहती हैं कि स्वस्थ रहने का नींद के घंटों से आवश्यक रूप से कोई लेना देना नहीं है. हमारी जीवनशैली, हमारे स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार होती है. हालांकि इस बात को लेकर सब एकमत हैं कि रात को 2-3 घंटे की नींद लेना किसी भी लिहाज़ से ठीक नहीं है. तो 2018 में कोई वादा करना ही है तो नींद पूरी करने की कसम खाइए. नींद पूरी होगी तो बाकी वादे भी पूरे होते रहेंगे.दिलचस्प यह है कि हर देश रिसर्च के जरिए दावा करता है कि वह नींद से वंचित है. ऑस्ट्रेलिया का मानना है कि वहां के नागरिक 5, साढ़े 5 घंटे से ज्यादा की नींद नहीं ले पाते. यूके भी अपने आपको इसी श्रेणी में रखता है. वहीं एक फिटनेस बैंड बनाने वाली कंपनी ने भारत में सर्वे करवाया. सामने आया कि दुनिया में नींद से वंचित देशों की लिस्ट में भारत नंबर दो पर है, तो जापान नंबर एक पर. कुल मिलाकर हर देश अपने नागरिको के नींद पूरी न होने की समस्या से जूझ रहा है.
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तो सवाल यह है कि कितनी देर की नींद को पूरी नींद कहा जाए. विभिन्न मेडिकल संस्थाएं समय समय पर नींद को लेकर दिशा निर्देश लेती आई हैं. आमतौर पर गाइडलाइऩ्स कहती हैं कि छह से नौ साल के बच्चों को 11 घंटे की नींद लेनी चाहिए. वहीं किशोरावस्था में 8-10 घंटे की नींद काफी है. इस उम्र में 11 घंटे तक सोना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है. 18 से 64 साल तक के लिए सात से नौ घंटे की नींद काफी है. 65 साल से ऊपर सात-आठ घंटे सोने के लिए कहा जाता है लेकिन इसमें भी बुज़ुर्ग जल्दी उठने और फिर दिन में झपकी लेना पसंद करते हैं.हालांकि नींद का अध्ययन इन घंटों में सिमटने वाला नहीं है. विशेषज्ञ कहते हैं कि घंटे नहीं, नींद की गुणवत्ता ज्यादा मायने रखती है. यानि 8 घंटे सोने के दौरान अगर बार बार नींद टूटती है तो उससे बेहतर 5 घंटे की पक्की नींद जिसके बाद आप ताज़ा महसूस करते हैं. इसलिए भरपूर नींद क्या है, वो घंटे नहीं आप खुद तय करते हैं. वहीं कई लोग ऐसे भी होते हैं जो 8 घंटे सोकर भी आलस और थका हुआ महसूस करते हैं और इसे नींद पूरी नहीं होने का नाम देते हैं.
ऐसा एक सीमित आयु वर्ग के साथ ज्यादा होता है. बताया जाता है कि दुनिया भर में नींद की समस्या हर उम्र की औरत को किसी भी मर्द से ज्यादा होती है. हालांकि उस उम्र में महिलाओं के साथ यह दिक्कत ज्यादा पेश आती है जब उनके बच्चे छोटे होते हैं और काम का बोझ ज्यादा होता है. उम्र के साथ मर्द और औरत में यह अंतर कम होता जाता है. इसके अलावा कैफाइन और शराब भी नींद की गुणवत्ता को खराब करता है. देर रात की पार्टियां और अनिश्चित जीवनशैली भी इस परेशानी में हाथ बंटाती है. कुछ लोग हफ्ते भर कम सोते हैं और छुट्टी के दिन उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं. हालांकि यह तरीका कारगर नहीं है और ऐसा करने से आप बेहतर महसूस करें, ऐसी संभावना कम ही है.
इन दिनों शिफ्ट में काम और फोन की लत ने भी नींद हराम कर रखी है. जानकार बताते हैं कि शिफ्ट और उसमें भी डेस्क जॉब करने वालों की नींद में ज्यादा खलल पड़ता है. वहीं रात को बंद लाइट में फोन निहारने की आदत भी आपकी नींद पर असर डालती है. ऐसा करने वाले युवाओं की संख्या ज्यादा है और उनमें भी कई तो ऐसे भी हैं जो सोने से पहले ही नहीं, आधी रात को भी करीब 10 बार अपना फोन चेक करते हैं. तो इस नए साल बिस्तर पर जाने से पहले फोन को नहीं, नींद को गले लगाइए. यकीन मानिए, आप बेहतर महसूस करेंगे.
Article source: http://www.jagran.com/delhi/new-delhi-city-16489089.html
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