Thursday, 26 April 2018

310 करोड़ कागज़ तो बचा लिए लेकिन 2.36 करोड़ बेरोजगारों का क्या ?


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रेल मंत्रालय ने बीती मंगलवार को एक प्रेस रिलीज जारी कर खुशखबरी दी है कि अगस्त 2015 से रेलवे भर्ती से जुड़ी साड़ी प्रक्रियाएं ऑनलाइन हो गयी है. इस साल अब तक रेलवे ने दो बार कुल 89409 पदों के लिए वेकेंसी निकाली है जिसके लिए कुल 2 करोड़ 37 लाख 56 हज़ार लोगों ने अप्लाई किया था. मंत्रालय का कहना है कि परीक्षाएं ऑनलाइन कराने से A4 साइज़ के 310 करोड़ कागजों की बचत हुई चार लाख पेड़ कटने से बचे हैं.बेरोजगारों का क्या ?
PIB (प्रेस इंफोर्मेशन ब्यूरो) के जरिए जारी ये प्रेस रिलीज देश में बेरोज़गारी की बढ़ती समस्या को भी सामने लाती है. रेलवे ने 89409 पदों के लिए भर्ती निकली थी जिसके लिए 2.37 करोड़ लोगों ने आवेदन किया. ऐसे में अगर भर्तियां वक़्त से हो भी जाएं तो 2.36 करोड़ बेरोजगार ज्यों के त्यों बने रहेंगे. सरकार 310 करोड़ कागजों की बचत तो बता रही है लेकिन इन करोड़ों बेरोजगारों पर फिलहाल कोई बात नहीं कर रहा. पिछले दिनों यूपी सरकार में निकली 368 पदों पर चपरासी की भर्ती के लिए 23 लाख लोगों ने फॉर्म भरे थे, जिनमें 255 लोगों के पास PhD की डिग्री थी. इसके अलावा 2 लाख से ज्यादा के पास BTech, BSc, Mcom और MSc की डिग्रियां थीं.


रेलवे में ही नहीं, सभी महकमों में सरकारी नौकरियां घटी हैं
श्रम मंत्रालय के 2016 के आखिरी सर्वे में बताया गया है कि 2013 में केंद्र की सीधी भर्तियों में 1,54,841 लोगों को नौकरी मिली थी जबकि 2014 में ये तादाद घटकर 1,26,261 रह गई. 2015 में यह संख्या और भी घटी और महज़ 15,877 लोग ही केंद्र की सीधी भर्तियों में नौकरी पा सके.


2013 के मुकाबले 2015 तक अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों को दी जाने वाली नौकरियों में 90% तक कमी देखी गई. इसी सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 2013 में इस वर्ग के 92,928 लोगों को केंद्र सरकार ने सीधी भर्तियों में नौकरी दी, जबकि 2014 में ये घटकर 72,077 रह गए और 2015 में सिर्फ 8,436.


हैरानी यह है कि केंद्र सरकार को 2016 के बाद से पता ही नहीं कि बेरोजगारी की स्थिति क्या है क्योंकि श्रम मंत्रालय ने 2016 के बाद से ऐसा सर्वे ही नहीं कराया है. यह सर्वे लेबर ब्यूरो कराता था. श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने इस बारे में एक जवाब में बताया कि इसे बेरोजगारी से जुड़े मुद्दे हल करने के लिए बनाई गई एक टास्क फ़ोर्स की सलाह के बाद बंद किया गया है. फिलहाल रोज़गार आंकड़ों के लिए सरकार EPFO से मिलने वाले डेटा पर निर्भर है.



क्या कहता है NCS पोर्टल
एनसीएस (नेशनल करियर सर्विस) पोर्टल नौकरी मांगने वालों और देने वालों को एक प्‍लेटफॉर्म देता है. रजिस्‍टर्ड इम्‍पलायर इस पोर्टल पर नौकरी मांगने वालों की प्रोफाइल छांटता है. अगर बेरोज़गार जरूरी शर्तें पूरा करता है तो उसे नौकरी मिल सकती है. बता दें कि इस पोर्टल के जरिए अभी तक देश के 4 करोड़ युवाओं ने सीधे नौकरी मांगी है, पर मिली 8 लाख युवाओं को. ये कुल नौकरी मांगने वालों के दो फीसदी हैं. हालांकि एनसीएस पोर्टल पर 14.86 लाख एम्‍पलॉयर रजिस्‍टर्ड हैं. CMIE रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत में बेरोज़गारों की संख्या में बीते एक साल में 7.1% का उछाल देखा गया है.


प्राइवेट सेक्टर के हालात भी ख़राब
रोजगार के मामले में देश की प्राइवेट कंपनियों की हालत भी ठीक नहीं है. LT जैसी बड़ी कंपनियों ने अप्रैल 2016 से जनवरी 2017 तक अपने 16000 नियमित और 50000 अनियमित लोगों को यह कहकर निकाल दिया कि पिछले 2 सालों से कारोबार मंदा है. TATA ने हाल ही में अपने 6000 नियमित और 50000 अनियमित लोगों को निकालने का आदेश दिया है. गुरुस्वामी के मुताबिक IT सेक्टर में पिछले 3 सालों में लाखों लोगों की नौकरियां गई हैं, जिसके चलते लाखों स्किल्ड लोग बेरोजगार हो गए हैं.


इकॉनोमिक सर्वे में भी जताई गई चिंता
साल 2016-17 के इकॉनोमिक सर्वे में भी इकॉनोमिक एडवाइजार अरविंद सुब्रमण्यन ने भी घटते रोज़गार के अवसरों को लेकर चिंता जाहिर की है. अरविंद के मुताबिक- ‘रोज़गार पैदा करना फिलहाल भारत के सामने मौजूद सबसे बड़ी चुनौतियों में एक है. इनफॉर्मल सेक्टर, अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर और सीजनल मजदूर भारतीय रोज़गार इंडस्ट्री में वर्क फ़ोर्स एक बड़ा हिस्सा है. फिलहाल इन तीनों को ही अंडर एम्पलॉयमेंट, स्किल शॉर्टेज, पुराने पड़ चुके मजदूर कानूनों और अमानवीय लेबर कॉन्ट्रैक्ट्स के जरिए काम करना पड़ता है. मौजूदा सरकार को पहले इन चुनौतियों को समझना होगा तभी उसके द्वारा शुरू की गईं दीनदयाल अंत्योदय योजना नेशनल अर्बन लाइवलीहुड मिशन (DAYNULM) और मुद्रा लोन जैसी योजना कारगर साबित हो पाएंगी.’



किस राज्य में क्या है स्थिति
श्रम मंत्रालय के 2016 के आंकड़े और CMIE रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में बेरोजगारी दर अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है और बीते तीन सालों में 1.8% से बढ़कर 10.2% पर पहुंच गई है. दूसरे नंबर पर 10.6% बेरोजगारी दर के साथ केरल और 10% के साथ त्रिपुरा तीसरे नंबर पर है. उत्तराखंड और दिल्ली कम बेरोज़गारी दर के मामले में सबसे बेहतर हैं. यहां यह दर 1.2 और 1.5 प्रतिशत है. सिर्फ 2 राज्य ऐसे हैं जहां बीते तीन साल में बेरोज़गारी दर घटी है. गुजरात में ये 0.8% और कर्नाटक में 1.4% घटी है, हालांकि फिलहाल गुजरात में बेरोज़गारी दर 9.5% और कर्नाटक में 5.1% है. देश की बेरोज़गारी दर फरवरी 2018 तक बढ़कर 6.1% हो गई है जो बीते 15 महीनों में सबसे ज्यादा है.


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