Tuesday, 1 May 2018

ब्रिटेन का वो डायरेक्टर जिसने फिल्म शुरू होने के बाद महारानी की एंंट्री पर भी रोक लगा दी थी!


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अगर आप हॉलीवुड फिल्म्स देखने को शौकीन हैं तो आप अल्फ्रेड हिचकॉक के नाम से ज़रूर परिचित होंगे. 1960 में हिचकॉक की एक फिल्म आई थी ‘साइको’. ये फिल्म अपने आप में एक कल्ट फिल्म मानी जाती है. इस फिल्म का एक मर्डर का सीन इस हद तक मशहूर हुआ कि न जाने कितने फिल्म निर्देशकों ने इसे कॉपी करने की कोशिश की. या यूं कहे कि आज से करीब 58 साल पहले जो माइलस्टोन हिचकॉक ने स्थापित किया उसे आज तक कोई हिला नहीं सका. इसका कारण यह भी है कि हिचकॉक ने उस वक़्त में सीमित संसाधनों में जो कर के दिखाया वह आज उच्च कोटि के संसाधनों के इस्तेमाल से कर पाना ज़रा मुश्किल है.यूं ही नहीं कहा जाता मास्टर आॅफ सस्पेंस
अगर आप हॉरर या थ्रिलर फिल्म देखने में हिचकते हैं तो साइको का क्लाइमैक्स आपको बुरी तरह चौंका सकता है. मैं अपनी बात करूं तो मैंने तो वह सीन आते ही लैपटॉप का फ्लैप डाउन कर दिया था. फिल्म’साइको’ के ही आखिरी सीन तक दर्शक के मन में लगातार यह सवाल बना रहता है कि आखिर कातिल है कौन. इसके अलावा उनकी एक और फिर ‘स्ट्रेंजर इन अ ट्रेन’ दर्शकों के मन में इस कदर थ्रिल पैदा करती है कि क्लाइमैक्स तक आप इसी ऊहापोह में रहते हैं कि आखिर हीरो का पीछा विलेन से किस तरह छूटेगा.हिचकॉक की और भी कई फिल्मों में ऐसे सीन आपको मिल जाएंगे जो उन्हें सिनेमा के इतिहास में अभूतपूर्व माने जाते हैं. यूं ही नहीं उन्हें मास्टर ऑफ सस्पेंस कहा जाता.


alfred hitchcock


फिल्म साइको का एक सीन

बिना शब्दों के पूरी कहानी कह देने की कला
सस्पेंस के मास्टर कहे जाने वाले अल्फ्रेड हिचकॉक की आज डेथ एनिव​र्सरी है. हिचकॉक का जन्म 13 अगस्त 1899 को इंग्लैंड के लेटॉनस्टोन में हुआ था. साल 1980 में 29 अप्रैल को उनकी मौत कैलिफोर्निया में हुई. 1920 की शुरुआत में हिचकॉक ने साइलेंट फिल्म्स से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की. वह साइलेंट फिल्मों में दिखाए जाने वाले आर्ट टाइटल डिज़ाइन करते थे. 1924 में हिचकॉक और उनकी पत्नी ने जर्मनी में रहकर सिनेमा मास्टर एफ डब्लू मुर्नौ से फिल्ममेकिंग सीखी. मुर्नौ ने ही उनको बिना शब्दों के पूरी कहानी कह देने की कला सिखाई जिसे खुद हिचकॉक ने भी कुबूल किया. अब जबकि हिचकॉक की लगभग सारी फिल्में समाप्त हो चुकी हैं. ऐसे में 1923 में उनके द्वारा बनाया गया साइलेंट मेलोड्रामा अभी भी यूट्यूब पर मौजूद है जो कि न्यूज़ीलैंड फिल्म आर्काइव में मिला था. इस फिल्म की रील खुद हिचकॉक के पोते ने आर्काइव को दान में दी थी.


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अल्फ्रेड हिचकॉक

ब्रिटिश सिनेमा को दी आवाज़
ब्रिटिश सिनेमा को आवाज़ देने का श्रेय भी हिचकॉक को ही जाता है. 1929 में आई फिल्म ‘ब्लैकमेल’ उनकी पहली हिट फिल्म थी. साथ ही यह ब्रिटेन की पहली बोलती फिल्म भी मानी जाती है. उनकी फिल्म देखने वालों को शायद ही यह मालूम हो कि वह खुद अपनी 39 फिल्मों में दिख चुके हैं. इन फिल्मों में उनकी स्क्रीन पर उपस्थिती चंद सेकेंड की ही रही. ‘लाइफबोट’ फिल्म में तो वह अखबार में छपे एक वेट लॉस एडवरटाइज़मेट में दिखे थे जिसे फिल्म का ही एक कैरेक्टर पढ़ रहा था. हिचकॉक को जितनी सफलता बड़ी स्क्रीन पर पर्दे के पीछे रहकर मिली उतनी ही छोटी स्क्रीन पर कैमरे के सामने.


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फिल्म साइको का पोस्टर

फिल्म एक्टर्स के इंटरव्यू पर लगाया था बैन
1958 में आई हिचकॉक की फिल्म ‘वर्टिगो’ कई मूवी पोल्स में टॉप पर रही है. लेकिन इसके बनने के बाद करीब 20 साल तक ‘वर्टिगो’ समेत 5 फिल्में दर्शकों के लिए अनुपलब्ध हो गई. 1980 में हिचकॉक की मृत्यु के 3 साल बाद जब इन फिल्मों के राइट्स यूनिवर्सल पिक्चर्स ने ले लिए तब दर्शकों के लिए ये क्लासिक फिल्म्स फिर से उपलब्ध हो पाईं. 1960 में आई साइको फिल्म हिस्ट्री में बेहतरीन ट्विस्ट्स वाली फिल्म कही जाती है. यह फिल्म रॉबर्ट ब्लोच के एक नॉवेल से प्रेरित है. जब यह फिल्म रिलीज़ हुई तो हिचकॉक ने इस नॉवेल की जितनी भी प्रतियां मार्केट में उपलब्ध थीं वह खरीद लीं. साथ ही 9 हज़ार डॉलर में उन्होंने किताब के राइट्स भी ले लिए. क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि किसी भी तरह फिल्म का सस्पेंस खत्म हो जाए. इतना ही नहीं उन्होंने फिल्म के एक्टर्स पर भी इंटरव्यू देने के लिए रोक लगा दी. ‘साइको’ फिल्म के मार्केटिंग मटीरियल में लॉबी कार्ड भी छपवाए गए. जिन पर बकायदा लिखा हुआ था कि हम नहीं चाहते कि आप खुद को कोई भी धोखा दें. आपको साइको शुरूआत से ही देखनी पड़ेगी. इसलिए ऐसी कोई उम्मीद न करें कि फिल्म शुरू होने के बाद आपके लिए थियेटर के दरवाज़े खोले जाएंगे. यदि हम कह रहे हैं किसी के लिए नहीं तो मतलब किसी के लिए नहीं. न ही मैनेजर के भाई के लिए, न संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रपति के लिए और न ही इंग्लैंड की महारानी के लिए.


‘द बर्ड्स’ का किस्सा
1963 में आई फिल्म हिचकॉक की फिल्म ‘द बर्ड्स’ का एक किस्सा काफी चर्चित है. हिचकॉक ने लंदन के ओडियन लिसेस्टर स्कॉयर थियेटर में इस फिल्म का प्रीमियर रखा. चूंकि इस फिल्म के दौरान थियेटर में पक्षियों की आवाज़ गूंज रही थी. इसलिए उन्होंने दर्शकों को चौंकाने के लिए थियेटर के आसपास मौजूद पेड़ों में लाउडस्पीकर छिपा दिए जिनमें से चिड़ियों की आवाज़ निकल रही थी. जैसे ही दर्शक थियेटर के बाहर आए तो उस आवाज़ से वह बुरी तरह चौंक गए जिससे वहां भगदड़ मच गई. दरअसल फिल्म में एक सीन ऐसा था जिसमें चिड़ियों का झुंड हमला कर देता है और वह बेहद डराने वाला था.


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अल्फ्रेड हिचकॉक की फिल्म ‘साउंड्स आॅफ द बर्ड्स’ साल 1963 में आई थी.

कभी नहीं मिला बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड
आज जबकि किसी के टैलेंट को मापने का पैमाना अवॉर्ड बन चुके हैं तो ये जानना ज़रूरी है कि हिचकॉक को कभी भी बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड नहीं मिला. हालांकि उनकी फिल्मों को ऑस्कर नॉमिनेशन्स ज़रूर मिले. 1940 में आई उनकी फिल्म ‘रिबेका’ को बेस्ट फिल्म का खिताब मिला. लेकिन व्यक्तिगत तौर पर वह हमेशा खाली हाथ ही घर लौटे.आखिरकार जब अकेडमी ने उन्हें साल 1967 में इरविंग जी थेलबर्ग मेमोरियल अवॉर्ड से सम्मानित किया. तब उन्होंने अपनी स्पीच में सिर्फ 5 शब्द कहे. वह थे, ‘Thank you, very much indeed’.

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