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दिल्ली उच्च न्यायालय ने थल सेना में नर्सिंग सेवा में सिर्फ महिलाओं को रखने की परंपरा को पुरातनपंथी बताया है. साथ ही, केंद्र से पूछा है कि रक्षा बल की इस शाखा में पुरूषों को क्यों नहीं शामिल किया जा सकता? कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की सदस्यता वाली एक पीठ ने कहा, ‘यह बहुत पुराने ढंग का और बहुत ही पुरातनपंथी है. खासतौर पर थल सेना में आपका समूचा नर्सिंग ब्रांच बगैर पुरूषों के कैसे हो सकता है?’पीठ ने रक्षा मंत्रालय को भी एक नोटिस जारी कर एक जनहित याचिका पर जवाब मांगा है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि इंडियन मिलिट्री नर्सिंग सर्विस में भर्ती में खुल्लम खुल्ला भेदभाव है.
अपनी याचिका में इंडियन प्रोफेशन नर्सेस एसोसिएशन ने कहा है कि भारत में कई हजार प्रशिक्षित और योग्य पुरूष पेशेवर नर्स हैं और थल सेना के नर्सिंग कोर से उनका बाहर रहना अनुचित और असंवैधानिक है. यह उन्हें रोजगार के अवसर से वंचित करता है. अधिवक्ता अमित जार्ज और रिषभ धीर द्वारा दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि यह कार्य सेना और राष्ट्र को प्रतिबद्ध पेशेवरों की बड़ी संख्या से वंचित करता है.
पीआईएल के जरिए मिलिट्री नर्सिंग सर्विस अध्यादेश, 1943 और मिलिट्री नर्सिंग सर्विस (इंडिया) नियम 1944 के प्रावधानों को चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि ऐसा भेदभाव संवैधानिक योजना के उलट है और इसलिए यह असंवैधानिक, अवैध और मनमाना है.
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