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एक युवक फैमिली फंक्शन में शरीक होने के लिए दिल्ली से उत्तराखंड गया. उसके पास एक फोन आया और उससे कहा गया कि आधार लिंक न होने के कारण उसका फोन कुछ ही देर में बंद हो जाएगा. चूंकि वह फोन के ज़रिये ही फंक्शन मैनेज कर रहा था तो उसने मांगे गए डिटेल्स दे दिए. इसके बाद उससे कहा गया कि वेरिफिकेशन के लिए उसका फोन आधे घंटे बंद रहेगा और फिर चालू हो जाएगा, लेकिन एक बार उसका फोन बंद हुआ तो तीन दिन चालू नहीं हुआ.इन तीन दिनों में उसके बैंक अकाउंट से लाख रुपए से ज़्यादा गायब हो गए. वह युवक जब पुलिस के पास पहुंचा तो उससे कहा गया कि यह मामला दूसरे थाना क्षेत्र का है, वहां शिकायत करवाए. वह वहां गया तो उससे कहा गया कि घटना के वक्त वह उत्तराखंड में था तो वहां रिपोर्ट करवाए. वह वहां पहुंचा तो बोला गया कि मोबाइल नंबर दिल्ली का है तो मामला वहीं दर्ज होगा. वह फिर दिल्ली पहुंचा तो इस बार कहा गया कि साइबर सेल में रिपोर्ट करवाए. साइबर सेल में रिपोर्ट करवाने पहुंचने पर कहा गया कि आॅनलाइन रिपोर्ट दर्ज करे. जब आॅनलाइन रिपोर्ट दर्ज की तो उसके पास संदेश आया कि कौन एसआई इस केस को देखेगा.
अब वह थोड़ा चैन महसूस कर ही रहा था कि उस एसआई का फोन उसके पास आया और उस एसआई ने अपनी व्यस्तता और परेशानियां बताते हुए कहा कि आप लोग रिपोर्ट कर देते हैं. लेकिन हम क्या करें. उसने बताया कि उसके पास बहुत से केस और काम हैं वह फिलहाल इस पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकता. इन चक्करों से थककर वह युवक मीडिया के पास गया तो मीडिया में भी बस उसकी आपबीती छपकर रह गई.
बुज़ुर्ग महिला को जब यह सूचना किसी फोन या मैसेज के ज़रिये नहीं मिलती कि उनका अकाउंट आधार से लिंक हुआ या नहीं तब वह अकाउंट चेक करती हैं और धोखे की शिकार होने की खबर मिलते ही वह सन्न रह जाती हैं. इस बुज़ुर्ग महिला ने तुरंत पुलिस से इस धोखाधड़ी की शिकायत की तो केस साइबर सेल ट्रांसफर हुआ और फिर तफ्तीश शुरू हुई. इस बार तफ्तीश अंजाम तक पहुंची और एक ऐसी कहानी सामने आई जिसने कई राज़ खोल दिए.
जुड़ते चले गए सिरे से सिरे
आनंद विहार की बुज़ुर्ग महिला पुलिस के पास पहुंच तो केस साइबर सेल को ट्रांसफर हुआ. साइबर सेल की तफ्तीश में पता चला कि सारे पैसे अलग-अलग ई-वालेट में चले गए हैं. सर्विस प्रोवाइडर से बात करके 40 हज़ार रुपये तो वापस मंगा लिए गए लेकिन बाकी की रकम से अलग-अलग लोगों का बिजली का बिल भरा जा चुका था. जिनके बिल ई-वालेट से भरे गए थे, उन सबके पते राजस्थान के जोधपुर के निकले. ये सारे बिल एक ठेकेदार सुरेंद्र ने भरे थे.

इस ठेकेदार सुरेंद्र को जब हिरासत में लिया गया तो उसने कहा कि उसका काम शाबिर के कहने पर बिल भरने का है. दरअसल ई-वालेट से कैश नहीं निकाला जा सकता. ई-वालेट का इस्तेमाल इसी तरह के बिल भरने के लिए किया होता है. फिर शाबिर पर दबिश दी गई और उससे मिले सुरागों के बाद गैंग के मास्टरमाइंड रामकुमार मंडल समेत चार लोग गिरफ्त में आ गए.
‘हैलो मास्टर’ का कच्चा चिट्ठा
रामकुमार 2011 में झारखंड से मुंबई पहुंचा. एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले रामकुमार ने मुंबई में मोबाइल रिचार्ज करने का काम शुरू किया. इसी काम के दौरान वह मोबाइल फोन के बारे में अच्छी जानकारी रखने वाले लोगों के संपर्क में आया. उनसे धीरे-धीरे वह बहुत कुछ सीखता चला गया. उसने मोबाइल को हैक करने के साथ ही यह भी सीख लिया कि मोबाइल फोन रिचार्ज के ज़रिये किसी के अकाउंट में कैसे सेंध लगाई जा सकती है.
कुछ ही वक्त में रामकुमार मोबाइल फोन के ज़रिये सेंधमारी और जालसाज़ी का खिलाड़ी बन चुका था. अब उसे खयाल आया कि वह अपना बिज़नेस शुरू करे. इसके लिए उसने अपने गांव को चुना जहां कई बेरोज़गार नौजवानों की भीड़ थी. उसे अपने बिज़नेस के लिए आसानी से वर्कर्स मिल सकते थे. रामकुमार गांव पहुंचा और उसने ऐसे कुछ लड़कों को चुनकर मोबाइल फोन के बारीक तकनीकी पहलू समझाकर उन्हें हैकर और जालसाज़ के रूप में ट्रेंड कर दिया. इनके ज़रिये झारखंड से ही उसने देश के कई राज्यों के लोगों के बैंक अकाउंट में सेंध लगाई.
इसके बाद रामकुमार ने अपने गांव में ही एक बड़ा स्कूल जैसा खोल दिया जहां नौजवानों को मोबाइल फोन की ये तकनीकें समझाकर उन्हें धोखाधड़ी और जालसाज़ी के लिए ट्रेंड किया जाता रहा. झारखंड के जामताड़ा के गांवों से ये नेटवर्क चलना शुरू हो गया और देश भर के लोगों के बैंक अकाउंट में सेंध लगने का सिलसिला चलता रहा. अब वह अपने चेलों के बीच और गांव के साथ ही देश भर में फैल चुके गैंग में हैलो मास्टर के नाम से पुकारा जाने लगा था.
हैलो मास्टर बना गांव का रॉबिनहुड
कुछ तो अपने गांव करमाटांड़ की तरक्की भी देखना चाहता था रामकुमार और कुछ उसे अंदेशा भी था कि कभी पुलिस पहुंच सकती है इसलिए इस बीच उसने गांव के लोगों की आर्थिक मदद करने का चलन भी निकाला. इस धोखाधड़ी से चुराए पैसों से वह गांव में सबका भला करता था और धीरे—धीरे जामताड़ा का रॉबिनहुड बन चुका था.
एक नहीं, दो नहीं कई बार पुलिस अधिकारी उसे पकड़ने उसके गांव तक पहुंचे लेकिन रामकुमार के बचाव में पूरा का पूरा गांव खड़ा हो जाता था और पुलिस को खाली हाथ लौटना पड़ता था. थाना रिकॉर्ड्स के मुताबिक साइबर क्राइम संबंधी पड़ताल के लिए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, अंडमान-निकोबार, ओडिशा, जम्मू कश्मीर समेत 22 राज्यों की पुलिस जामताड़ा के करमाटांड़ व नारायणपुर सहित आसपास के गांवों तक पहुंच चुकी थी. देखते ही देखते पिछले छह—सात सालों में रामकुमार ने अपना एंपायर खड़ा कर लिया. झारखंड में रामकुमार का करोड़ों रुपयों से बना एक आलीशान बंगला है जिसके दरवाज़े रिमोट कंट्रोल से संचालित होते हैं.
ऐसे गिरफ्त में आया मास्टरमाइंड
पिछले कुछ सालों से रामकुमार का गैंग झारखंड के अलावा दिल्ली, राजस्थान और गोवा जैसे राज्यों में भी फैल चुका था. नेक्सस कुछ ऐसा था कि गोवा के लोगों के साथ ठगी से लूटी गई रकम से दिल्ली में शॉपिंग होती तो दिल्ली के पैसों का इस्तेमाल राजस्थान में होता. रामकुमार के खिलाफ कई जगह केस हैं और 25 राज्यों की पुलिस उसे तलाश रही थी. दिल्ली पुलिस ने जब रामकुमार को पकड़ने की योजना शुरू की तो उसे पता चला कि जामताड़ा का गांव रामकुमार का गढ़ है और पहले भी पुलिस खाली हाथ लौटी है.

रामकुमार मंडल उर्फ सीताराम
योजन के तहत दिल्ली पुलिस सादे लिबास में जामताड़ा पहुंची. उसने लोकल पुलिस से सम्पर्क नहीं किया. गांव पहुंचने से पहले पुलिस टीम अलग-अलग हिस्सों में बंट गई. टीम के कुछ लोग ऑटो से तो कुछ बस से गांव पहुंचे. फिर गांव में पहुंचकर सब एक साथ हुए और सीधे रामकुमार के घर पर दबिश दी. रामकुमार को गिरफ्त में लेने के बाद तलाशी में उसके घर से छुपाकर रखा गया करीब पांच लाख कैश मिला. साथ ही, कई कंप्यूटर, मोबाइल, सिम कार्ड्स और अन्य सामान बरामद हुआ.
भारत का नाईजीरिया बन चुका है जामताड़ा
दुनिया के साइबर क्राइम के गढ़ के रूप में नाईजीरिया बदनाम है और भारत में झारखंड का जामताड़ा पिछले कुछ समय से इसी राह पर दिखता है. जामताड़ा के करमाटांड़-नारायणपुर इलाके साइबर ठगी के गढ़ बन चुके हैं. इलाके के गांवों के नौजवान धड़ाधड़ साइबर अपराध में एंट्री ले रहे हैं. करमाटांड़ थाना क्षेत्र में कुल 150 गांव हैं. पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक 100 से ज़्यादा गांवों के नौजवान साइबर अपराध से जुड़ चुके हैं. 12 से 25 साल के करीब 80 प्रतिशत युवा इस सिंडिकेट से जुड़े हैं. 1000 से अधिक युवाओं का सिंडिकेट चल रहा है. एटीएम नंबर व पिन जानने के बाद खाते से रुपये उड़ाने में इन शातिरों को तीन मिनट से ज़्यादा नहीं लगते.
बिना मेहनत के ठगी से हो रही इस अवैध कमाई से झारखंड के इस इलाके के साइबर अपराधियों का लाइफस्टाइल शहरों को मात देता है. पैदल चलने वाले लोग महंगी गाड़ियों में घूमते दिखते हैं. इस इलाके के बदलते समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में इन भटके हुए नौजवानों को परिवारों का पूरा समर्थन हासिल है. यहां तक सुना जाता है कि बच्चों को पढ़ाने से अच्छा है, साइबर अपराधी बनने की ट्रेनिंग दे देना.

और कितने रामकुमार हैं जामताड़ा में?
झारखंड के जामताड़ा को साइबर अपराध का हब कहा जाता है. देशभर का 80 प्रतिशत साइबर क्राइम यहीं से संचालित हो रहा है. साइबर क्राइम के नौजवान अपराधी देश के कई शहरों से अब तक करोड़ों रुपये की ठगी को अंजाम दे चुके हैं. एक खबर के मुताबिक तमिलनाडु में 200 से ज़्यादा पुलिसकर्मी तक शिकार बन चुके हैं. जामताड़ा के साइबर अपराध का दायरा कश्मीर से कन्याकुमारी तक है.
जामताड़ा के इस नेक्सस में दिल्ली पुलिस ने रामकुमार मंडल उर्फ सीताराम को गिरफ्तार कर एक कामयाबी तो हासिल की है लेकिन अब सवाल यह है कि इस इलाके में ऐसे और कितने रामकुमार यानी मास्टरमाइंड या गैंगस्टर हैं? यहां एक व्यवस्था के अनुसार बड़े अपराधी छोटे साइबर अपराधियों को शरण देते हैं और उनके ज़रिये ठगी करवाते हैं. एक और सवाल है कि क्या साइबर ठगी के इस पैसे का इस्तेमाल ड्रग्स, हथियार या मानव तस्करी जैसे अन्य अपराधों या फिर नक्सलियों को फंडिंग के लिए तो नहीं हो रहा?
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