
READ MORE
मुंबई के सात साल पुराने इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट ज्योर्तिमय डे (जेडे) मर्डर केस में मकोका कोर्ट का फैसला आ चुका है. कोर्ट ने इस मामले में माफिया सरगना छोटा राजन को दोषी करार दिया है. अक्सर लोग यह सोचकर हैरान होते हैं कि कभी एक दूसरे के जिगरी दोस्त रहे मुंबई के दो सबसे बड़े डॉन छोटा राजन और दाऊद इब्राहिम आखिर एक दूसरे के खून के प्यासे कैसे हो गए. कई लोग यह भी मानते हैं कि इनकी दोस्ती में दरार 1993 में मुंबई में सीरियल ब्लास्ट के बाद पड़ी, लेकिन यह सच नहीं है. आइए जानते हैं, इन दोनों सरगनाओं की दोस्ती के दुश्मनी में बदलने की दास्तां….असली नाम राजेंद्र सदाशिव निखल्जे
छोटा राजन का असली नाम राजेंद्र सदाशिव निखल्जे है. उसकी कहनी महाराष्ट्र के तिलकनगर चेंबूर से शुरू होती है. बीएमसी में काम करने वाला सदाशिव यहीं तीन बेटों और दो बेटियों समेत 30 लोगों के परिवार के साथ रहता था. राजन को बचपन में पढ़ाई कम और मारधाड़ वाली फिल्में ज्यादा पसंद थी, क्योंकि वह खुद भी मारपीट करता था. एक दिन उसने एक पुलिस वाले की लाठी छीनकर सबके सामने उसे पीट दिया. इस जुर्म में वह गिरफ्तार हुआ, लेकिन ज़मानत किसी और ने नहीं, बल्कि डॉन राजन नायर ऊर्फ अन्ना राजन ने ली.
ऐसे बना छोटा राजननये छोकरों पर पैनी नज़र रखने वाला अन्ना ताड़ गया था कि छोकरें में दम है. दरअसल, राजेंद्र उर्फ राजन के अपराधों की चर्चा अन्ना तक पहुंच चुकी थी. ज़मानत लेने के बाद राजन अन्ना के गैंग में शामिल हो गया. उसे साहकार सिनेमा घर पर टिकट ब्लैक करने का काम मिला. गैंग में दो राजन होने से लोगों को असुविधा होने लगी. लिहाजा, अन्ना को बड़ा राजन और राजेंद्र को छोटा राजन कहा जाने लगा. राजन के टपोरी से डॉन बनने में गुरु अन्ना का बड़ा योगदान रहा. बहुत जल्दी छोटा राजन अन्ना राजन गैंग में नंबर दो हो गया.
ऐसा बना राजन गैंग का सरगना
अस्सी के दशक के शुरू में पठान गिरोह को दाउद इब्राहिम कासकर और उसके साथियों से चुनौती मिलने लगी. पठानों ने दाऊद के भाई साबिर इब्राहिम को धोखे से मार दिया. बदला लेने में अन्ना ने दाऊद की मदद की और पठान गैंग के आमिरज़ादा की हत्या की सुपारी ले ली. 1983 में कोर्ट में जज के सामने आमिर की हत्या कर दी गई. इसका बदला लेते हुए पठानों ने 24वें दिन अन्ना को एस्प्लानेड कोर्ट के बाहर दिन दहाड़े मार दिया. अन्ना के मरने के बाद राजन गैंग का सरगना हो गया. इस दौरान उसकी मुलाकात दाऊद से हो चुकी थी.
फिर हुई दाऊद से दोस्ती
इसी बीच दाऊद का राजन के घर आना-जाना शुरू हुआ. राजन अपने बचपन की दोस्त पड़ोस में रहने वाली हम उम्र सुजाता से प्यार करता था. दाऊद सुजाता को बहन कहने लगा और सुजाता उसे राखी बांधने लगी. सुजाता के कारण राजन और दाऊद की दोस्ती इमोशनल हो गई. यही इमोशनल रिश्ता दोनों को एक दशक तक दोस्ती की डोर में बांधे रहा. बहरहाल, दाऊद राजन पर ज़्यादा भरोसा करने लगा, जिससे राजन डी-कंपनी में नंबर दो हो गया. पठान गैंग के समद खान को मारने में दाऊद के साथ छोटा राजन अपने साथियों के साथ था. 1986 में दाऊद के दुबई जाने के बाद डी-कंपनी को संभालने की ज़िम्मेदारी छोटा राजन पर आ गई.

डी-कंपनी को दिया कॉर्पोरेट रूप
कई सीनियर क्राइम रिपोर्टर कहते हैं कि राजन ऊर्फ नाना ने डी-कंपनी के कामकाज को कॉरपोरेट रूप दे दिया. दाऊद उसकी कार्य-शैली का कायल था. कंपनी का कोई भी ऑपरेशन राजन के अप्रूवल के बिना नहीं होता था. राजन ने गैंग को दुनिया का सबसे संपन्न, ताकतवर और ख़तरनाक क्राइम सिंडिकेट बना दिया. दाऊद गिरोह की ताकत समकालीन रशियन और इज़राइल माफिया गिरोहों से भी ज़्यादा बढ़ गई. राजन रिमोट कंट्रोल से अंडरवर्ल्ड में स्मगलिंग, हफ़्ता वसूली, हवाला और कॉन्ट्रेक्ट किलिंग के काले धंधे को चलाने लगा. सिंडिकेट ड्रग और हथियार तस्करी के धंधे में भी था, लेकिन हफ़्ता वसूली और रीयल इस्टेट से सबसे ज़्यादा पैसे बरस रहे थे.
दाऊद-राजन की दोस्ती में ऐसे पड़ी दरार
राजन और दाऊद के रिश्ते में संदेह की दीवार सबसे पहले तब खड़ी हुई, जब राजन ने मई 1992 में शिवसेना के कॉर्पोरेट खीमबहादुर थापा की हत्या दाऊद से पूछे बिना करवा दी. इससे पहले दाऊद के शूटर ने उसके साथी की हत्या कर दी थी. इसी दौरान सावत्या और साटम के बीच मतभेद होने लगे. शकील ने सावत्या का पक्ष लिया तो राजन ने साटम का साथ दिया. उसी समय अरुण गवली गिरोह ने ऐसा काम कर दिया, जिससे दाऊद-राजन की दोस्ती में दरार पड़ गई.
12 सितंबर 1992 को बृजेश सिंह, सुभाष ठाकुर, बच्ची पांडेय, सावत्या, श्याम गरिकापट्टी, श्रीकांत राय और विजय प्रधान जैसे खतरनाक शूटरों समेत 24 लोग जेजे में दाखिल हुए और बीमार शैलेश को गोलियों से छलनी कर दिया. फायरिंग में दो पुलिसकर्मियों की जान भी गई. 10 लोग गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें मरीज़ और नर्स भी थे.

1992 के बाद और बढ़ गईं दूरियां
1992 में दाऊद और राजन के बीच फासला और ज़्यादा गहराने लगा. दाऊद क्राइम वर्ल्ड का बेशक बेताज बादशाह था, पर उसे हमेशा डर सताता था कि कहीं अपने ही न उसे रास्ते से हटा दें. इस बीच एक और घटना ने दाऊद-राजन के बीच की खाई और चौड़ा कर दिया. राजन के ख़ास तैय्यब भाई को दाऊद के शूटरों ने मार डाला. राजन को बताया गया कि तैय्यब को बग़ाबत की सज़ा दी गई. इसी बीच दाऊद ने राजन से मुंबई की बजाय दुबई का कारोबार देखने को कहा पर नाना तैयार न हुआ. दाऊद मुंबई में हिंदू नहीं, बल्कि कट्टर मुस्लिम कमांडर चाहता था. लिहाज़ा राजन को साइडलाइन कर अबू सलेम को यह दायित्व दे दिया. राजन समझ गया, कोई बड़ा गेम होने वाला है. लिहाज़ा, नया विकल्प तलाशने लगा. वह दुबई में ही था, लेकिन दाऊद से दूर हो गया था. फिर एक दिन किसी अज्ञात जगह चला गया.
फिर मुंबई में हुए धमाके
इसी दौरान मुंबई में सीरियल ब्लास्ट हुआ, जिसने अंडरवर्ल्ड के समीकरण ही बदल दिए. अपराधी धर्म के आधार पर बंट गए. दाऊद को गद्दार कहता हुआ राजन औपचारिक रूप से अलग हो गया. राजन ने डी-कंपनी को ख़त्म करने की कसम ले ली. देश-विदेश में फैले साथियों को उसने ऑपरेशन दाऊद पर काम बंद करने और अपने लिए काम करने का निर्देश दिया. राजन, गवली औ नाईक बंधु हिंदू डॉन के रूप में उभरे, जबकि दाऊद की इमैज पाकिस्तानपरस्त मुस्लिम डॉन की बन गई.
कैसे खत्म होगी दुश्मनी?
बेहद शक्तिशाली होने के बावजूद दोनों डॉन एक दूसरे से डरते थे. दाऊद के लिए राजन सबसे बड़ा खतरा है, तो राजन के लिए दाऊद. राजन ने दाऊद को मारने के लिए अपने सात शॉर्प शूटर नेपाल के रास्ते कराची के उसके आवास तक भेजे थे, लेकिन ऑपरेशन लीक हो गया. दाऊद ऐन मौक़े पर वहां आया ही नहीं. उसे साज़िश की भनक लग गई थी. यह भी बात फैली थी कि दाऊद को सबक सिखाने के लिए राजन रॉ और आईबी की मदद कर रहा है. कहा जाता है कि क्राइम ब्रांच के कई डबल एजेंट दाऊद के आसपास हैं. वे दाऊद की डेली लोकेशन और दिनचर्या की जानकारी देते रहते हैं. बहरहाल दौऊद-राजन की यह जंग तभी खत्म हो सकती है, जब दोनों में से किसी एक का अंत हो जाएं.
ये भी पढ़ें: जेडे मर्डर केस: मकोका कोर्ट में छोटा राजन दोषी करार, जिग्ना वोरा और जोसेफ पॉल्सन बरी
Article source: http://feedproxy.google.com/~r/ndtvkhabar/~3/Ls5qV978tEE/story01.htm
No comments:
Post a Comment