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संदीप शास्त्रीप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक में 1 मई को तीन रैलियों को संबोधित किया. अपनी रैलियों में पीएम मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर सीधा हमला बोला. बीजेपी की कोशिश है कि कर्नाटक चुनाव पीएम मोदी और राहुल गांधी के बीच की लड़ाई बन जाए.पीएम ने कहा कि राहुल गांधी उच्चवर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि वह खुद आम लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
कर्नाटक चुनाव का ध्यान रखते हुए पीएम ने 2+1 कहकर सिद्धारमैया की तरफ इशारा किया. सिद्धारमैया दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं और उनके बेटे यतींद्र भी इस साल राजनीति में कदम रख रहे हैं. वहीं उन्होंने वंशवाद की तरफ इशारा करते हुए राज्य के मंत्रियों को 1+1 कहकर संबोधित किया.
पीएम ने यह भी कहा कि उनके और कर्नाटक की जनता के बीच संवाद के लिए कन्नड़ भाषा कोई बंधन नहीं है. पीएम की तीनों ही बातों से यह साफ होता है कि बीजेपी कर्नाटक की लड़ाई को मोदी बनाम राहुल रखना चाहती है. बीजेपी को उम्मीद है कि इससे पार्टी को फायदा मिलेगा.भले ही बीजेपी चाहती है कि कर्नाटक की लड़ाई मोदी बनाम राहुल बन जाए पर उन्हें यह देखना होगा कि क्या यह राज्य के लिए प्रासंगिक है. हालिया जैन यूनिवर्सिटी-लोकनीति पोल में यह सामने आया कि लीडरशिप के मामले में कर्नाटक में मोदी राहुल से 15 प्रतिशत आगे हैं. हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है. कर्नाटक में पीएम मोदी बीजेपी के प्रचार अभियान के केंद्र में हैं जबकि कांग्रेस में राहुल गांधी के साथ ऐसा नहीं है.
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कांग्रेस चाहती है कि कर्नाटक की लड़ाई सिद्धारमैया बनाम येदियुरप्पा हो. दोनों ही अपनी-अपनी पार्टी के सीएम पद के उम्मीदवार हैं. इसीलिए राहुल गांधी की रैलियों में भी मुख्य वक्ता सिद्धारमैया ही होते हैं जबकि प्रधानमंत्री की रैलियों में अब से सीएम उम्मीदवार उपस्थित ही नहीं होंगे. येदियुरप्पा केवल पीएम की पहली रैली में शामिल हुए थे. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बीजेपी पूरे प्रदेश में अपनी पकड़ बनाना चाहती है. कई लोगों का मानना है कि बीजेपी को लगता है कि येदियुरप्पा के साथ मंच साझा करते हुए पीएम मोदी भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस सरकार के खिलाफ कड़ा अटैक नहीं कर सकेंगे.
दूसरी तरफ कांग्रेस कर्नाटक चुनाव को स्थानीय मुद्दों पर लड़ना चाहती है. सिद्धारमैया ने यह बताने का कोई मौका नहीं छोड़ा है कि कांग्रेस अभियान स्थानीय मुद्दों पर आधारिता है और इसे स्थानीय नेता ही लीड कर रहे हैं. उन्होंने कई मौकों पर यह भी कहा है कि बीजेपी की केंद्रीय लीडरशिप बार-बार अपने सीएम कैंडिडेट को साइडलाइन कर देती है. कन्नड़ प्राइड का मुद्दा उठाते हुए सिद्धारमैया ने इसे बाहरी लोगों द्वारा कन्नड़ों का अपमान भी बताया है.
येदियुरप्पा के बेटे को टिकट नहीं दी गई, रेड्डी बंधुओं की राजनीति में वापसी और सीएम उम्मीदवार का कहना कि चुनाव में 15-20 सीटें जीतने के लिए उन्हें टिकट देना जरूरी था, बीजेपी की सेंट्रल लीडरशिप का रेड्डी बंधुओं से दूरी बनाकर रहना और अंततः पहली रैली के बाद पीएम की रैलियों से येदियुरप्पा का गायब रहना… ये सब इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि बीजेपी स्थानीय नेताओं को पीछे ही रखना चाह रही है. अब देखना यह है कि दोनों में से किसी स्ट्रैटेजी को कर्नाटक की जनता अपना समर्थन देती है.
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बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि राज्य सरकार पर पीएम के हमलों को असरदार बनाने के लिए उन्हें मुख्यमंत्री और कांग्रेस की वंशवाद की राजनीति पर फोकस करना होगा. दो सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर बीजेपी सिद्धारमैया पर सीधा हमला बोल रही है. मुख्यमंत्री दो सीटों से चुनाव लड़ने के अपने कदम का जवाब नहीं दे पा रहे हैं.
भले ही कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो सीटों से चुनाव लड़ने का मुद्दा उठा रही है लेकिन इसका बहुत अधिक असर होता नहीं दिख रहा है. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस मंत्रियों के रिश्तेदारों को टिकट दिए जाने को लेकर बीजेपी कांग्रेस पर लगातार हमले कर रही है. बता दें कि बीजेपी ने सीएम उम्मीदवार येदियुरप्पा के बेटे को टिकट नहीं दिया. हालांकि बीजेपी की लिस्ट में भी प्रमुख नेताओं के रिश्तेदारों के नाम हैं, वहीं रेड्डी बंधुओं के रिश्तेदारों को टिकट देने की वजह बीजेपी का यह वार हल्का पड़ सकता है.
इस चुनाव में कन्नडिगा फैक्टर और कन्नड़ भाषा एक महत्वपूर्ण फैक्टर के तौर पर उभर रही है. बता दें कि दक्षिण भारत में यह पहला चुनाव है जिसमें पीएम मोदी बीजेपी को जिताने की कोशिश कर रहे हैं. उत्तर और पश्चिम भारत में जनता से हिंदी में बात करना और उनसे इमोशनली जुड़ना पीएम के लिए अधिक आसान था.
कर्नाटक एक टेस्ट केस होगा कि क्या भावनाएं ट्रांसलेशन का बंधन तोड़ सकती हैं या इससे प्रभावित होती हैं. प्रचार के लिए 10 दिन बाकी हैं और अब हर दिन एक नया ट्विस्ट देखने को मिल सकता है.
(लेखक जैन यूनिवर्सिटी के प्रो. वीसी हैं और लोकनीति नेटवर्क के राष्ट्रीय को-ऑर्डिनेटर हैं. यह उनकी व्यक्तिगत राय है.)
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